कालपी से ग्वालियर का कूच
झाँसी से निकलने के बाद महारानी लक्ष्मीबाई कालपी पहुँचीं, जहाँ उन्होंने तात्या टोपे और राव साहेब के साथ मिलकर ब्रिटिश सेना का सामना किया। 22 मई 1858 को कालपी के युद्ध में पराजय के बाद, क्रांतिकारियों ने ग्वालियर के अभेद्य किले पर अधिकार करने की योजना बनाई।
ग्वालियर का शासक जयाजीराव सिंधिया अंग्रेजों का वफादार था। जब क्रांतिकारी सेना ग्वालियर पहुँची, तो सिंधिया की सेना ने अपनी तोपें रानी की ओर करने के बजाय उनके समर्थन में विद्रोह कर दिया। सिंधिया को आगरा भागना पड़ा और बिना खून बहाए ग्वालियर के विशाल किले और खजाने पर क्रांतिकारियों का अधिकार हो गया।
अंतिम रण और सर्वोच्च बलिदान
17 जून 1858 को ग्वालियर के बाहरी इलाके ''कोटा-की-सराय'' (Kotah-ki-Serai) पर अंग्रेजों ने आक्रमण कर दिया। महारानी लक्ष्मीबाई, पुरुषों की सैन्य पोशाक धारण किए, साफा बांधे और पीठ पर पुत्र दामोदर राव को लिए युद्ध भूमि में उतरीं। इस युद्ध में उनका सामना ''8th Hussars'' (ब्रिटिश घुड़सवार सेना) की अत्याधुनिक टुकड़ी से हुआ।
रानी का नया घोड़ा ग्वालियर की स्वर्ण रेखा नदी के पास बने एक नाले को पार करने से बिदक गया। ब्रिटिश सैनिकों ने रानी को घेर लिया। एक सैनिक की तलवार ने उनके सिर के पिछले हिस्से पर गहरा वार किया। अत्यधिक रक्तस्राव के बावजूद, उस सिंहनी ने अपने हमलावरों को मौत के घाट उतारा और वह बाबा गंगादास की कुटिया की ओर गिर पड़ीं। उनकी अंतिम इच्छा के अनुसार बाबा गंगादास की कुटिया में ही तुरंत उनकी चिता सजाई गई ताकि अंग्रेजों का हाथ उनके पवित्र शरीर को न लगे।
प्रामाणिक ऐतिहासिक स्रोत:
- "The Indian Mutiny of 1857" - Col. G. B. Malleson - ग्वालियर के युद्ध और 8th Hussars के साथ हुए अंतिम संघर्ष का प्रामाणिक विवरण।
- सर ह्यू रोज़ का पत्र (Sir Hugh Rose's Tribute) - युद्ध के पश्चात ब्रिटिश कमांडर ने स्वयं लिखा: "भारतीय विद्रोहियों में वह सबसे महान, सबसे बहादुर और सबसे योग्य सैन्य नेतृत्वकर्ता थी।"