झाँसी पर संकट के बादल
1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के दौरान, झाँसी विद्रोह का एक प्रमुख केंद्र बन चुका था। 23 मार्च 1858 को, ब्रिटिश जनरल सर ह्यू रोज़ (Sir Hugh Rose) के नेतृत्व में ''सेंट्रल इंडिया field फोर्स'' ने एक विशाल सेना और भारी तोपखाने के साथ झाँसी के किले की घेराबंदी शुरू कर दी। सर ह्यू रोज़ जानता था कि झाँसी का किला अपनी अभेद्य वास्तुकला और मजबूत प्राचीर के लिए पूरे भारत में विख्यात है।
तोपखाने का घमासान और दुर्गा दल
किले की रक्षा का भार रानी लक्ष्मीबाई ने स्वयं अपने कंधों पर लिया। किले की प्राचीर पर स्थित ऐतिहासिक तोपें— ''कड़क बिजली'', ''भवानी शंकर'', और ''घनगर्जन'' लगातार आग उगल रही थीं। कड़क बिजली तोप का संचालन मुख्य तोपची गुलाम गौस खान और खुदा बख्श कर रहे थे। रानी की अचूक मारक क्षमता देखकर ब्रिटिश सेनापति भी अचंभित थे।
इस युद्ध की सबसे बड़ी विशेषता थी रानी का ''दुर्गा दल'' (महिला सेना)। वीरांगना झलकारी बाई के नेतृत्व में झाँसी की महिलाओं ने भी पुरुषों के कंधे से कंधा मिलाकर तोपें चलाईं, गोला-बारूद ढोया और टूटी हुई दीवारों की मरम्मत की।
विश्वासघात और किले से ऐतिहासिक निकास
3 अप्रैल 1858 को झाँसी के ही एक गद्दार, दूल्हा जू (Dulha Ju) ने किले का दक्षिणी द्वार अंग्रेजों के लिए खोल दिया। ब्रिटिश सेना किले में घुस गई और भयंकर नरसंहार शुरू हो गया। गुलाम गौस खान और मोतीबाई किले की रक्षा करते हुए वीरगति को प्राप्त हुए। झलकारी बाई ने रानी का वेश धारण कर अंग्रेजों को उलझाए रखा, जिससे रानी को समय मिल सके।
4 अप्रैल की मध्यरात्रि को, रानी लक्ष्मीबाई ने अपने दत्तक पुत्र दामोदर राव को पीठ पर बांधा, दोनों हाथों में तलवारें लीं, और अपने प्रिय घोड़े ''बादल'' पर सवार होकर किले की प्राचीर से छलांग लगा दी।
प्रामाणिक ऐतिहासिक स्रोत:
- "History of the Indian Mutiny" - Sir John Kaye and Col. G.B. Malleson - झाँसी की घेराबंदी और बेतवा के युद्ध का विस्तृत सैन्य विवरण।
- सर ह्यू रोज़ का पत्र (Sir Hugh Rose's Tribute) - युद्ध के पश्चात ब्रिटिश कमांडर के सैन्य अभिलेख।
- "माझा प्रवास" - विष्णु भट्ट गोडसे - किले के अंदर का आँखों देखा भयानक और जीवंत वृत्तांत।